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Saturday, 25 February 2017

केरल के कातिलों को अब पूरे देशभर में जवाब दिया जायेगा: रौशन राणा।

*कन्नूर के कातिल*--४
समता सिर्फ हिंसा में

*माकपाई हत्यारों ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं या उसे छोड़ने वालों को भी नहीं बख्शा। वे कांग्रेस, मुस्लिम लीग और यहां तक कि अपने गठबंधन साथी भाकपा के भी कई कार्यकर्ताओं की हत्या कर चुके हैं।*

इसमें सबसे बड़ा नाम वडागरा के माकपा बागी टी़ पी़ चंद्रशेखरन का रहा है। उनकी 2 मई 2012 को बेहद वीभत्स तरीके से हत्या की गई थी। बाद में अफवाह फैलाई गई थी कि हत्यारे जिस गाड़ी से आए थे, उस पर अरबी में आयतें लिखी हुई थीं। यानी यह बताने का प्रयास किया गया कि गुनहगार इस्लामिक कट्टरपंथी थे।

*इस हत्या से माकपा खुद बुरी तरह हिल गई थी। उस वक्त केरल विधानसभा में पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री वी़ एस़ अच्युतानंदन ने सार्वजनिक रूप से हत्या की निंदा की और वे मृतक की विधवा को सांत्वना देने पहुंचे थे। मुख्यमंत्री की इस पहल की पार्टी के एक धड़े ने कड़ी आलोचना की, जिनमें उनके धुर विरोधी पिनरई विजयन भी शामिल थे।
संघ के खिलाफ माकपा की हाल की हिंसात्मक कार्रवाई तिरुअनंतपुरम के निकट कट्टईकोनम में हुई थी।*

वहां संघ प्रचारक अमल कृष्ण पर हमला किया गया था। हमलावरों ने उनके सिर पर लोहे की छड़ से प्रहार किया था, उनके सिर की हड्डियां कई स्थानों से टूट गईं। यह हमला 14 मार्च, 2016 को हुआ। अमल कृष्ण उभरते इंजीनियरिंग स्नातक हैं। हमले के बाद वह कई हफ्तों तक वह वेंटिलेटर पर रहा। लंबे समय बाद वह सामान्य हो सका है।

*उपरोक्त सभी घटनाएं संक्षिप्त रूप में बताई गई हैं। स्थानाभाव के कारण कुछ ही नाम दिए जा सके हैं। केरल में अभी तक 200 से अधिक संघकर्मियों को जान से हाथ धोना पड़ा है, जिनमें से अधिकांश माकपा अपराधियों के हमले का शिकार हुए हैं।*

केवल कन्नूर जिले में ही 78 स्वयंसेवक माकपाई हमलावरों के शिकार बन चुके हैं। लब्बोलुआब यह कि केरल की शांति भंग होने का कारण माकपा-संघ के बीच संघर्ष नहीं बल्कि संघ कार्यकर्ताओं के खिलाफ माकपा के हमले रहे हैं।


*संघ का शांति प्रयास*
*संघ की ओर से इस हत्या-राजनीति को सुलझाने के लिए नए रास्ते तलाशने की पहल करना मामले का महत्वपूर्ण पक्ष है। इस बारे में संघ ने कई कदम भी उठाए। आइए, संघ की ओर से उठाए गए इन कदमों का आकलन करें। संघ के शांति प्रयासों को किसने बिगाड़ा?*

1977 के मध्य में श्री पी़ परमेश्वरन ने नई दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के निदेशक का कार्यभार संभाला था। उन्होंने 1981 के अंत तक यह जिम्मेदारी निभाई। उन दिनों माकपा की खूनी राजनीति पूरे जोर पर थी। उनके द्वारा की जाने वाली हिंसा का शिकार समूचा केरल था।

*कन्नूर जिले का तलासेरी तालुका, अलप्पुझा जिले का कुट्टनाडु क्षेत्र और त्रिशूर जिले का तटवर्ती क्षेत्र विशेष तौर पर हिंसा की चपेट में था। निदार्ेष संघ कार्यकर्ताओं के रक्त से इन क्षेत्रों की गलियां लाल हो चुकी थीं। ये हालात 1978 से कायम थे। जाहिर है, शांतिप्रिय संघ नेता इस खूनखराबे का अंत चाहते थे।*

उन्होंने इस बारे में माकपा नेताओं से संवाद कायम करना चाहा। परमेश्वरन जी ने इस बारे में संघ के केरल प्रांत प्रचारक के़ भास्कर राव से संपर्क साधा। इसी पहल के तहत परमेश्वरन जी ने ई़ एम़ एस़ नम्बूदिरीपाद को पत्र लिखा जो तब माकपा के महासचिव थे और दिल्ली में ही थे। ईएमएस ने उन्हें सकारात्मक जवाब दिया था।

*इसके बाद परमेश्वरन जी ने ईएमएस से फोन पर बात की थी। ईएमएस ने केरल के मुख्यमंत्री और पोलित ब्यूरो सदस्य ई़ के. नयनार से बात करने का प्रस्ताव रखा जो उन दिनों दिल्ली आने वाले थे। इस बारे में ईएमएस की नीति सरल थी:  मामला केरल से जुड़ा था और नयनार केरल के मुख्यमंत्री थे।*

इसी नीति के आधार पर दिल्ली में संघ-नयनार की बैठक का दिन व समय तय हुआ। श्री रंगाहरि और केरल के तत्कालीन प्रांत प्रचारक के़ भास्कर राव भी दिल्ली पहुंचे। परंतु उस दिन दिल्ली में कुछ अप्रत्याशित घटनाएं घट गई थीं।

*केरल के अभाविप कार्यकर्ता वी़ मुरलीधरन (भाजपा के पूर्व राज्य प्रमुख) को तलास्सेरी में माकपा-संघ दंगों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। परंतु दिल्ली स्थित अभाविप केंद्र को सूचना मिली कि केरल राज्य के अभाविप संयोजक सचिव और संघ प्रचारक के. जी़ वेणुगोपाल को गिरफ्तार किया गया है।*

जाहिर है, इससे खासा रोष फैला। अभाविप कार्यकर्ताओं ने केरल हाउस में मुख्यमंत्री का घेराव किया जो घंटों तक चला। दिल्ली पहुंचे परमेश्वरन जी और संघ अधिकारी बैठक पर इससे पड़ने वाले असर से चिंतित थे। परमेश्वरन जी ने नयनार को फोन किया। मुख्यमंत्री का जवाब सकारात्मक था। उन्होंने कहा, ''तो क्या हुआ परमेश्वरन जी? आखिर वे नवयुवक हैं। आप अपने साथियों के साथ आइए, हम बात करेंगे!!''

*शुरुआती बातचीत में मुख्यमंत्री नयनार के साथ काबीना सहकर्मी और कांग्रेस (एस) नेता पी़ सी़ चाको (उन दिनों कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता) थे। श्री भास्कर राव, परमेश्वरन जी और श्री रंगाहरि ने संघ का प्रतिनिधित्व किया।*

नयनार ने मजाकिया अंदाज में 'लड़कों की शैतानी' का जिक्र किया। श्री रंगाहरि के अनुसार नयनार ने कहा कि वह केरल के लड़कों जैसे तेज नहीं थे; वे दिल्ली के लड़कों के बारे में बात करते रहे।
परंतु चाको के तेवर कुछ कड़े थे।

*उन्होंने कहा कि अभाविप कार्यकर्ता अखबारों में चाकू छुपाकर लाए थे। लेकिन नयनार ने उन्हें रोका। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता कोई हथियार नहीं लाए थे। संघ अधिकारियों को यह आभास हुआ कि माकपा हिंसा के उस अध्याय को समाप्त करने के प्रति संघ के प्रयासों के खिलाफ नहीं थी।*

लिहाजा, दोनों दलों ने केरल में दूसरे चरण की बातचीत के लिए हामी भरी। रंगाहरि जी ने कहा, नयनार ने अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में कहा कि वे केरल पहुंचते ही मीडिया को इस संवाद की जानकारी देंगे। रंगाहरि जी को कोच्चि में अगली बैठक निर्धारित करने की जिम्मेदारी मिली। इस तरह वह दूसरे चरण की बातचीत के संयोजक थे।

*कोच्चि पहुंचने पर रंगाहरि जी ने वहां के वरिष्ठ माकपा नेताओं से संपर्क साधा। उन्होंने कहा कि संघ को माकपा के दफ्तर में बैठक करने से कोई एतराज नहीं होगा; परंतु माकपा को इसका यकीन नहीं हुआ—उनके कॉमरेड क्या सोचेंगे! संघ ने केरल राज्य कार्यालय में बैठक करने पर भी अपनी रजामंदी दी।*

परंतु माकपा नेता इसे भी खतरा ही मान रहे थे। इसके बाद दोनों ओर के नेता कोच्चि के एक भवन में बैठक करने पर राजी हुए। इस तरह एक स्वयंसेवक के घर का चुनाव हुआ, जो एक व्यवसायी थे, इसलिए माकपा भी उनके नाम पर राजी थी।

*कन्नूर के कातिल*--३

*आपातकाल उठने के बाद, वे सक्रिय स्वयंसेवकों के तौर पर सामने आए थे। कन्नूर, अलप्पुझा और त्रिशूर के तटवर्ती जिलांे में यह अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला था। आपातकाल के बाद भी संघ की ओर उनका यह पलायन जारी रहा। दरअसल, कार्यकर्ताओं का यह क्षरण माकपा को लगने वाले आखिरी झटकों में से था।*

उसके जो कार्यकर्ता संघ से जुड़े थे, उनकी हत्या करना ही माकपा नेतृत्व को समस्या का एकमात्र हल दिखा। इसके बाद, 1978 में कन्नूर जिले के तलासेरी में एक किशोर छात्र और पनुंद शाखा के मुख्य शिक्षक चंद्रन की हत्या के साथ उन्होंने हत्या के दौर की शुरुआत की। 

*खास बात यह है कि चंद्रन के पिता माकपा की स्थानीय समिति के सदस्य थे। इन हत्याओं के पीछे मंशा माकपा परिवारों को यह चेतावनी देना थी कि वे संघ से न जुड़ें। इसके बाद तलासेरी तालुका में हत्याओं का लंबा सिलसिला चला।* 

इसका माकपा की हिंसा का शिकार बने अधिकांश संघ कार्यकर्ता पूर्व माकपाई या माकपा परिवारों से ताल्लुक रखते थे। बाद में जब माकपा को महसूस हुआ कि तलवारों और चाकुओं से संघ के विस्तार को नहीं रोका जा सकता, तो उन्होंने बमों का सहारा लिया। 

*1978 के दौरान तलासेरी में कई संघ कार्यकर्ता मारे गए थे। इनमें प्रमुख थे संघ के खंड कार्यवाह करिमबिल सतीशन (1981), कन्नूर जिला के भाजपा सचिव पन्नयनूर चंद्रन (1986), भारतीय जनता युवा मोर्चा के राज्य उपाध्यक्ष जयकृष्णन मास्टर (छठी कक्षा के छात्रों को पढ़ाते समय उनकी हत्या की गई)*

कन्नूर जिले के शारीरिक प्रमुख मनोज (2014)। 1984 में कन्नूर सह जिला कार्यवाह सदानंदन मास्टर की घुटनों से नीचे दोनों टांगें काट दी गई थीं।

*इसी तरह, 1980 में कन्नूर अभाविप से जुड़े रहे जिला अधिकारी गंगाधरन को मार डाला गया था। वह उनका सरकारी नौकरी पर पहला दिन था। अभाविप के तत्कालीन संयोजक सचिव के. जी़ वेणुगोपाल एवं तत्कालीन जिला प्रचारक वी़ एन. गोपीनाथ के अनुसार गंगाधरन के सर्वेक्षण विभाग में आते ही वहां के एक कर्मचारी ने माकपा को सूचित कर दिया था।*

इसके बाद गंगाधरन की उनकी कुर्सी पर ही हत्या कर दी गई थी। शव को पोस्टमार्टम के लिए न भेजा जाए, इसके लिए हत्यारों ने जिला कलेक्टर को भी  धमकाया था!

*1979 में उन्हीं हत्यारों ने अलप्पुझा जिले में संघ सवयंसेवकों पर हमले जारी रखे। वहां संघ व भाजपा के कई लोग मारे गए थे। उनमें से पहलेे 27 वर्षीय गोपालकृष्णन थे, जिनकी 18 सितंबर, 1980 को हत्या की गई थी।*

माकपा हत्यारों ने उन्हें चलती बस से बाहर खींचकर चाकुओं से गोद डाला था। एक अन्य हत्या कुट्टनाडु में 1982 में खंड कार्यवाह विश्वम्भरम की थी। 15 वर्षीय प्रदीप 10वीं के छात्र थे जिनकी माकपा ने बेरहमी से हत्या कर दी थी।

*आपातकाल के दौरान त्रिशूर जिले में माकपाकर्मियों ने कई संघ कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। तटवर्ती जिलेे वदनपल्ली में कई घातक हमले किए गए थे। हमलावरों ने एक घर पर हमला किया और वहां आग लगा दी जिसमेंं एक व्यक्ति जल कर मर गया था।*

1984 में कोदुंगलूर तालुका कार्यवाह और कर्मठ संघकर्मी टी़ सतीशन को बीच रास्ते में मार डाला गया। उसी वर्ष एर्नाकुलम जिले के नयथोदु में माकपा तत्वों ने पूर्व प्रचारक अयप्पन की बम फोड़कर हत्या कर दी थी। 

*मार्च 1984 में एर्नाकुलम के ही त्रिप्पुनितुरा में उन्नीकृष्णन को मार दिया गया था।
1987 में तिरुअनंतपुरम जिले के मुरिक्कुमपुझा में एक ही घटना में तीन स्वयंसेवक मारे गए थे।* 

सितंबर 1996 में अलप्पुझा जिले के मन्नार के देवासम बोर्ड कॉलेज के तीन अभाविप कार्यकर्ताओं अनु, सजित और किम करुण को पम्पा नदी में डुबोकर मार डाला गया था। अक्तूबर 1996 में कोट्टायम जिले के चंगनासेरी में अभाविप सदस्य बिंबी की हत्या कर दी गई थी।


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