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Tuesday, 21 February 2017

एशियाइ देशो का नेतृत्व करेंगे मोदी,पहले चीन को था अधिकार,ट्रम्प ने अधिकार मोदी जी को दिया

पड़ोसी देश चीन, एशियाई देशों के बीच लंबे वक्त से दादागीरी दिखाता रहा है, लेकिन चीन की ये हेकड़ी अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के आने के बाद निकलती दिखाई दे रही है। अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालने के बाद कई ऐसे बयान दिए जिससे साफ हुआ कि चीन की दादागीरी पहले की तरह ही बरकरार नहीं रह पाएगी। लगातार बयानबाजियों से अमेरिका और चीन के रिश्ते तनाव में हैं, ऐसे में एशियाई देश संतुलन साधने वाली शक्तियों की तलाश में जुट गए हैं जो आक्रामक चीन और अनिश्चित अमेरिका दोनों के खतरों को बेअसर कर सके। ऐसे में भारत के सामने बड़ा मौका खुद ब खुद बन गया है और मोदी सरकार अगले कुछ हफ्तों में एशियाई देशों के साथ पहले से मजबूत तालमेल को और भी पुख्ता करने की योजना पर काम करने जा रहा है ताकि नए समझौतों के जरिए इलाके की नेतृत्वकारी ताकत के रूप में उभरा जा सके।

भारत आने वाले दिनों में कई देशों के नेताओं के साथ मेल-मुलाकातें करने वाला है। वियतनाम के विदेश मंत्री फाम बिन मिन और उप-राष्ट्रपति जल्दी ही भारत दौरे पर आएंगे। मलेशियाई प्रधानमंत्री नजीब रजाक की भी भारत आने की संभावना है, वहीं भारत इसी साल ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की भी मेजबानी कर सकता है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी अप्रैल में भारत दौरे पर आ सकती हैं, जबकि विदेश सचिव एस जयशंकर अभी श्रीलंका, चीन और बांग्लादेश के दौरे पर हैं। उनका यह दौरा पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने और इन देशों के साथ मजबूत रिश्तों के जरिए एशिया में भारत की भूमिका को विस्तार देने की कोशिश के लिहाज से देखा जा सकता है।
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने शुरूआती दिनों में ही ऐसे संकेत दिए हैं जिनसे लगता है कि अमेरिका और चीन के रिश्ते ठंडे ही रहने वाले हैं और इसका असर क्षेत्र के हर एक देश पर पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन ने अपने पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन के ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से हटते हुए साफ कर दिया है कि कुछ प्रमुख क्षेत्रों खासतौर पर व्यापार और शुल्कों पर उसका रवैया ज्यादा आक्रामक रहेगा। ट्रंप प्रशासन नहीं मानता कि टीपीपी से निकलने पर चीन को स्ट्रैटिजिक स्पेस मिल जाएगा। उसे लगता है कि चीन को काबू में रखने में टीपीपी का सीमित असर रहा है। ट्रंप प्रशासन को ये भी लगता है कि एशियाई देश किसी-न-किसी रूप में बीजिंग के इरादों से चिंतित हैं और वह इसके खतरे से बचने का रास्ता तलाशेंगे।

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